सुमन कुमार दत्ता -विशाल विचार(पाकुड़)
पाकुड़। नगर परिषद के चुनावी बिगुल ने जिले की फिजा में राजनीतिक तपिश बढ़ा दी है। इस बार का चुनाव तकनीकी रूप से भले ही ‘गैर-दलीय’ (बिना पार्टी सिंबल के) हो रहा है, लेकिन हकीकत धरातल पर इसके बिल्कुल उलट है। चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों को पार्टी के चुनाव चिन्ह से दूर रखा है, पर राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं और कार्यकर्ताओं का ‘खुला समर्थन’ इस जंग को व्यक्तिगत से ज्यादा प्रतिष्ठा की लड़ाई बना चुका है। सबसे दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण स्थिति यह है कि राजनीतिक दलों के अंदर ही एक नई जंग शुरू हो गई है—अपनों के खिलाफ अपनों की जंग।
दलीय आधार नहीं, फिर भी पार्टियों का ‘रिमोट कंट्रोल’
भले ही बैलेट पेपर पर कमल, हाथ, तीर-धनुष या लाल झंडा नजर न आए, लेकिन पाकुड़ की गलियों में यह साफ है कि कौन सा उम्मीदवार किस खेमे का है। भाजपा, झामुमो, कांग्रेस और आजसू जैसे प्रमुख दलों ने अपने-अपने ‘खास’ चेहरों को मैदान में उतारकर उन्हें मौन या खुला समर्थन दे दिया है। स्थिति यह है कि पार्टी के दिग्गज नेता सीधे तौर पर जनसंपर्क अभियानों में शामिल हो रहे हैं, जिससे यह चुनाव पूरी तरह से राजनीतिक रंग में रंग चुका है।
‘भीतरघात’ की नई इबारत: एक ही दल के कई दावेदार
इस चुनाव की सबसे बड़ी चुनौती पार्टियों के लिए ‘भीतरघात’ बन गई है। चूंकि चुनाव दलीय आधार पर नहीं है, इसलिए एक ही विचारधारा या एक ही पार्टी से जुड़े कई कद्दावर नेताओं ने अपनी दावेदारी ठोक दी है।
- दांव पर साख: जब पार्टी का आधिकारिक सिंबल नहीं होता, तो अनुशासन का डंडा चलाना मुश्किल हो जाता है।
- वोटों का बिखराव: एक ही पार्टी के समर्थक अब दो या तीन गुटों में बंट गए हैं। समर्थक असमंजस में हैं कि वे ‘पार्टी के घोषित पसंदीदा’ को चुनें या ‘पुराने साथी’ को।
- गुपचुप रणनीतियां: दलीय खेमों के भीतर एक गुट दूसरे को हराने के लिए विरोधी विचारधारा वाले उम्मीदवार को ‘अंडरग्राउंड’ सपोर्ट करने से भी गुरेज नहीं कर रहा है।
आमने-सामने होंगे ‘अपने’ ही
पाकुड़ के विभिन्न वार्डों और अध्यक्ष पद की दौड़ में ऐसी तस्वीरें आम हैं जहां कल तक एक ही मंच साझा करने वाले नेता आज एक-दूसरे की जड़ें काटने में लगे हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस बार जीत उसकी नहीं होगी जिसके पास बड़ी पार्टी का हाथ है, बल्कि उसकी होगी जो अपने ही कुनबे के ‘भीतरघात’ से खुद को बचा पाएगा।
“यह चुनाव पार्टी की विचारधारा से ज्यादा व्यक्तिगत रसूख और गुटीय समीकरणों पर टिका है। सिंबल न होने से नेताओं को बगावत करने का लाइसेंस मिल गया है।” — स्थानीय राजनीतिक विश्लेषक
मतदाता भी हैं खामोश
पार्टी समर्थित उम्मीदवारों की इस खींचतान के बीच पाकुड़ का आम मतदाता फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है। विकास के दावों और वादों के बीच मतदाता यह देख रहे हैं कि जो नेता अपनी पार्टी के भीतर समन्वय नहीं बना पा रहे, वे नगर की समस्याओं का समाधान कैसे करेंगे।
इस बार का चुनाव केवल नगर परिषद की कुर्सी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए भी एक ‘शक्ति प्रदर्शन’ (Power Show) माना रहा है। अब देखना यह है कि ‘भीतरघात’ की यह आग किस उम्मीदवार के सपनों को जलाती है और किसे जीत का ताज पहनाती है।
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